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Chapter Questions 14 MCQs
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
भक्तिन के संस्कार ऐसे हैं कि वह कारागार से वैसे ही डरती है, जैसे यमलोक से। ऊँची दीवार देखते ही वह आँख मूँदकर बेहोश हो जाना चाहती है। उसकी यह कमजोरी इतनी प्रसिद्धि पा चुकी है कि लोग मेरे जेल जाने की संभावना बता-बताकर उसे चिंतित रहते हैं। वह डरती नहीं, यह कहना असत्य होगा; पर डर से भी अधिक महत्व मेरे साथ का ठहरता है। चुपचाप मुझसे पूछने लगती है कि वह अपनी कफ धोती साबुन से साफ़ कर ले, जिससे मुझे वहाँ उसके लिए लज्जित न होना पड़े। क्या-क्या सामान बाँध ले, जिससे मुझे वहाँ किसी प्रकार की असुविधा न हो सके। ऐसी यात्रा में किसी के किसी के साथ जाने का अधिकार नहीं, यह आश्वासन भक्तिन के लिए कोई मूल्य नहीं रखता। वह मेरे न जाने की कल्पना से इतनी प्रसन्न नहीं होती, जितनी अपने साथ न जा सकने की संभावना से अपमानित।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
कई बार मनुष्य अपने अनुचित कार्यों या अवांछनीय स्वभाव के संबंध में दुखी होता है और सोचता है कि उन्हें वह छोड़ दे। उन कृत्यों की प्रतिक्रिया उसने देखी-भाली होती है। उसे परामर्श और उपदेश भी उसी प्रकार के मिलते रहते हैं, जिनमें सुधार करने की अपेक्षा रहती है। सुनने में यद्यपि वे सारगर्भित परामर्श होते हैं, किंतु जब छोड़ने की बात आती है तो मन मुंह मोड़ जाता है। अभ्यास प्रकृति को छोड़ने के लिए मन सहमत नहीं होता। आर्थिक हानि, बदनामी, स्वास्थ्य की क्षति, मानसिकलज्जा, आदि अनुभवों के कारण बार-बार सुधरने की बात सोचने और समय आने पर उसे न कर पाने से मनोबल टूटता है। बार-बार मनोबल टूटने पर व्यक्ति इतना दुर्बल हो जाता है कि उसे यह विश्वास ही नहीं होता कि उसका सुधार हो सकता है और यह कल्पना करने लगता है कि जीवन ऐसे ही बीत जाएगा और दुर्ब्यसनों से किसी भी प्रकार मुक्ति नहीं मिल सकेगी।
यह सर्वविदित बात है कि मनुष्य अपने मन का स्वामी है, शरीर पर भी उसका अधिकार है। सामान्य जीवन में वह अपनी अभिरुचि के अनुसार ही सोचकर कार्य करता है। किंतु दुर्ब्यसनों के संबंध में ही ऐसी क्या बात है कि वे चाहकर भी नहीं छूट पातीं और प्रयास करने के बावजूद भी सिर पर ही सवार रहती हैं।
अंधविश्वास, दिखावा, खींची शादियाँ, कृत्रिमता, तर्कहीन रीति-रिवाज जैसी अनेक कुरीतियाँ ऐसी हैं, जिन्हें बुद्धि-विवेक और तर्क के आधार पर हर कोई नकारता है, फिर छोड़ देने का समय आता है तो सभी पुराने अभ्यास चिंतन पर चल पड़ते हैं और वही करना होता है, जिसे न करने की बात अनेक बार सोची रहती है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति, शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाज़ार को देते हैं। न तो वे बाज़ार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाज़ार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाज़ार का बाज़ारीपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। कपट की बढ़ती का अर्थ परस्पर में सद्भाव की घटती। इस सद्भाव के ह्रास पर आदमी आपस में भाई-भाई और सगे-सगे और पड़ोसी फिर रह ही नहीं जाते हैं और आपस में करो ग्राहक और बेंचक की तरह व्यवहार करते हैं। मानो एक-दूसरे को ठगने की घात में हों।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उत्तर पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
बालपन तकनीक के जाल में बुरी तरह उलझ गया है। खेल, सूचनाएँ, अध्यवसाय से जुड़ी सामग्री, विद्यालय गतिविधियों की जानकारियाँ और मित्रता तक सभी कुछ बच्चों तकनीकी संसाधनों के माध्यम से ही हो रहे हैं। तकनीक के सीमित क्षेत्र में मानव ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली है। फलस्वरूप अवतरित होती सामाजिक बाध्यताएँ कहर ढा रही हैं, घटनाएँ घट रही हैं। इस तरह के लिए इस सामग्री में से बच्चों को कोई हिदायत या अभिभावकों की सहज सलाह ही स्वीकार नहीं। इस सामग्री ने बच्चों को मासूमियत ही नहीं समझ भी छीन ली है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मोबाइल गेमिंग की लत को एक डिसऑर्डर माना है। इस आभासी व्यस्तता के कारण एकाग्रता के साथ-साथ बच्चों की बाल सुलभ रचनात्मकता भी घट रही है। गेमिंग की लत के कारण शारीरिक गतिविधियाँ घटने से बच्चों को मोटापा, आलस्य और आँखों की समस्याएँ घेर रही हैं। एम्स के चिकित्सकों के अनुसार हमारे यहाँ 2050 तक लगभग 40 से 45 प्रतिशत बच्चे मायोपिया का शिकार हो जाएँगे।
बच्चों की इस बदलती दुनिया में अभिभावकों को सचेत रहकर चेतना जगाना आवश्यक है। बच्चों और बड़ों के बीच नियमित संवाद ज़रूरी है। घर का माहौल बदलना और माता-पिता को स्मार्टफोन्स की चकाचौंध से दूर रहना पहला कदम है। मोबाइल फोन की लत के विरुद्ध बच्चों को धीरे-धीरे संस्कार के सहारे जीवन जीने की ओर मोड़ना होगा। छोटी क्लासों में साइंस बि़जि़, मोबाइलफोन्स और अन्य गैजेट्स का सीमित व समुचित प्रयोग रिपोर्ट में परिलक्षित हो सकता है। बच्चों को खेल के मैदान में अधिकतम समय देना चाहिए। बच्चे 18 वर्ष की आयु तक तकनीकी माध्यमों से पूरी तरह मुक्त रहें यह भी नहीं कहा जा सकता। तकनीक के साथ सही संतुलन और संयम ही परिवार को सही सहज जीवन से जोड़ने का पहलू है, वहीं मोबाइल पर माता-पिता की सीमित और संयमित भूमिका भविष्य में बच्चों का जीवन सहेज सकती है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी "परचेजिंग पावर" के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति – शीतलन शक्ति, व्यंजन की शक्ति ही बाजार को देते हैं। न तो वे बाजार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाजार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजारीकरण बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि मूल्य बढ़ाना है। वस्तु की बढ़ती का अर्थ वस्तु में गुणों की घटती है। इस समष्टि में जब तक आदमी आपस में भाई-भाई और बहनें और पड़ोसी फिर से नहीं बन जाते हैं और आपस में खरीद और बेचने (क्रय-विक्रय) की तरह व्यवहार करते हैं। मानो दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दिखाई दे। और यह बाजार का, बल्कि इतिहास का, सत्य माना जाता है। ऐसे बाजार की बीच में लेकिन लोगों में आवश्यकताएँ तो असीमित नहीं होतीं; बल्कि शोषण होने लगता है। तब बाजार सशक्त होता है, विकृत विकराल होता है। ऐसे बाजार मानवता की निर्मिति विफल कर देंगे जो उचित बाजार का पोषण करता हो, जो सच्चा लाभ करता हुआ हो; वह शोषणरससिक्त और वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनैतिक-शास्त्र है।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
संवेदनशील व्यक्तियों में एक गुण उनका है जिसकी वृत्ति लेखन है। लेखक कोई मनोरंजनप्रिय नहीं है। इसमें विचारों से जुड़ना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए शब्द के सीमित संसार में अपनी भाषा को शब्दों में उतारना कष्टदायक भी हो जाता है। मगर जो अनुभूति, पीड़ा, हृदयस्पर्शी लेखन के हृदय में उमड़ता है, उसका अभिव्यक्त किया ही जाता है, भले ही पाठक कम हों या न हों। लेखक की एक कहानी में नायक लेखक है जिसकी कहानियों को कोई विशेष नहीं सुनता, मगर हर शाम वह घर लौटते वक्त घोड़े को अपनी कहानी सुनाता है। अनेक सृजनशील लेखकों के आरंभिक दौर में पाठक-प्रकाशक नहीं मिलते, किंतु वे निराश या गर्व में नहीं डूबते। जिनके पास कुछ ठोस कहन-लिखन की है, वे कभी चुनी हुई यात्राएँ नहीं थामते।
सृजन हलचल के अभिसरण नहीं है। यह कार्य पारंपरिक शक्तियों का है। लेखक कर्मठ नहीं माने गए हैं, जिसमें निवेदन के लिए अनुराग, निरंतरता और धैर्य आवश्यक होते हैं। आज सूचना के प्रसार में अद्वितीय बुद्धि में अधिक तीव्रता हो जाने से नए अर्थ नहीं लगाए जाने चाहिए कि लेखन, विचार और लिखित शब्द की गरिमा क्षीण हो रही है, बल्कि लिखने वालों पर यह दबाव है, कि समय का रास्ता बदल रहा है। डिजिटल तकनीक के प्रसार में जानने, सीखने, समझने के लिए आवश्यक जनों का स्थान पढ़ने-लिखने के बजाय बोलने-सुनने पर अधिक है। जब दुनिया अध्यात्मिकता की ओर बढ़ रही हो, तो लेखक-पाठक पुरानी शैली में कैसे हो सकते हैं।
पाठकों को भी कम्प्यूटर साधन अनुकूल और सुविधाजनक लगते हैं। मगर इससे लेखन की भूमिका गौण नहीं हुई है। नए विचारों की आवश्यकता बनी रहेगी। लेखक-पाठक का मुँहबंद शब्द के प्रति समर्पण कमतर नहीं हुआ है, उनके कहे-लिखे की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न नहीं उठेंगे और न उठे।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाज़ार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो, तब बाज़ार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो, लू का लू-पन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य से भरा हो, तो बाज़ार भी फैलाव-का-फैलाव ही रह जाएगा। तब वह घाव बिल्कुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाज़ार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। बाज़ार की असली कृतार्थता है -- आवश्यकता के समय काम आना।
यहाँ एक अंतर समझ लेना बहुत ज़रूरी है। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
बढ़ती उम्र के साथ हमारे दिमाग का संज्ञानात्मक कौशल, पहचानने और याद रखने की क्षमता मंद पड़ने लगती है। पर यह भी सच है कि हमारे दिमाग में यह क्षमता भी है कि उम्र बढ़ने के साथ वह नया सीख भी सकता है और पुराने सीखे हुए पर अपनी पकड़ बनाए रख सकता है। मेडिकली की भाषा में इसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं। पर इसके लिए आपको नियमित अध्ययन करना पड़ता है। रचनात्मकता बहुत सारी सूचनाओं के होने से ही नहीं आती। हम तब कुछ रच पाते हैं, जब सूचनाओं को ढंग से समझते हैं और पूर्व ज्ञान से उसे जोड़ पाते हैं। तभी वह हमारे गहन शिक्षण का हिस्सा बन पाती है और लंबे समय तक हम उसे याद रख सकते हैं।
हमारे दिमाग का बड़ा हिस्सा चीजों को उनके दृश्यचित्र व जगह के आधार पर भी याद रखता है। स्क्रीन पर हम लिखे हुए शब्दों को स्क्रॉल करते हुए आगे बढ़ जाते हैं या कुछ मिनटों बाद ही सोशल मीडिया या दूसरे लिंक्स पर चले जाते हैं, जबकि किताब का बहुआयामी दृश्यचित्र और उसमें लिखे शब्द स्थिर होते हैं। मनुष्य व्यक्ति को उस तरह प्रीत नहीं कर पाती जिस तरह प्यार व हमदर्दी से बने रिश्ते। इसलिए स्क्रीन समय के बढ़ते देश परंपरागत पढ़ाई के तौर-तरीकों को आगे बढ़ा रहे हैं। किताबों पढ़ने के बाद हमें अक्सर चीजें, चित्र या स्थान विशेष के साथ याद रहती हैं। लंबी याददाश्त के लिए डिजिटल स्क्रीन की जगह किसी को पढ़ना दिमाग के लिए अधिक बेहतर साबित होता है। समय-समय पर चीजों को दोहराएँ। उत्तम दिमाग को चुनौतियाँ दें। जब दिमाग को नई चुनौतियाँ दी जाएं, वह उत्तम बेहतर कार्य करता है। स्वस्थ्य दिमाग को जीवन का अंग बनाएँ।
निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनकर लिखिए :
कथन : भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा।
कारण : समय और परिस्थिति के अनुसार मूल तथ्यों में जोड़-घटाव करती थी।
‘थोड़ा बहुत झूठ बोलना’ के समर्थन में भक्तिन अपना आदर्श किसे मानती थी ?
भक्तिन घर में पड़े पैसों को मटकी में छिपाकर किस उद्देश्य से रखती थी ?
गद्यांश में ‘नरो वा कुंजरो वा’ का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है ?
निम्नलिखित पठित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्पों को चुनकर लिखिए :
भक्तिन की कंजूसी के प्राण पूंजीभूत होते-होते पर्वताकार बन चुके थे; परंतु इस उदारता के डायनामाइट ने क्षणभर में उन्हें उड़ा दिया । इतने थोड़े रुपयों का कोई महत्व नहीं; परंतु रुपयों के प्रति भक्तिन का अनुराग इतना प्रख्यात हो चुका है कि मेरे लिए उसका परित्याग मेरे महत्व की सीमा तक पहुँचा देता है । भक्तिन और मेरे बीच में सेवक-स्वामी का संबंध है, यह कहना कठिन है; क्योंकि ऐसा कोई स्वामी नहीं हो सकता, जो इच्छा होने पर भी सेवक को अपनी सेवा से हटा न सके और ऐसा कोई सेवक भी नहीं सुना गया, जो स्वामी के चले जाने का आदेश पाकर अवज्ञा से हँस दे । भक्तिन की नौकर कहना उतना ही असंभव है, जितना अपने घर में बारी-बारी से आने-जाने वाले अँधेरों-उजालों और आँगन में फूलने वाले गुलाब और आम को सेवक मानना ।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
इतिहास से विरासत में हमें ‘भारतीय संगीत’ जैसी अमूल्य निधि मिली है । अन्य देशों के संगीत की अपेक्षा इसकी विशेषता हमारे पूर्वजों की मान्यता के आधार पर है । भारत में संगीत क्षणिक आमोद-प्रमोद या अतृप्त तृष्णा की वस्तु न होकर, समस्त ब्रह्मांड से प्रेरणा का आभास है, आनंद प्रदान करने वाली आध्यात्मिक साधना है । मानव को ब्रह्म तक ले जाने वाला मार्ग है । संगीत के इस स्वरूप और ध्येय को हमारी सभ्यता के प्रारंभ में ही हमारे देश के लोगों ने पहचान लिया था और इसका विकास इन्हीं आदर्शों के अनुरूप किया गया था । भारतीयों के संगीत-प्रेमी होने की बात को उल्लेख मेघनादसाह ने भी की है । दूसरी शताब्दी ई.पू. में उन्होंने ‘इंडिका’ नामक अपने ग्रंथ में लिखा है कि ‘सर्व जातियों की अपेक्षा भारतीय लोग संगीत के कहीं अधिक प्रेमी हैं ।’
सहस्रों वर्षों से हमारे घरेलू और सांसारिक जीवन में लगभग सभी काम किसी न किसी प्रकार के संगीत से आंष्रित होते रहे हैं । जन्म से लेकर मृत्यु तक यह संगीत हमारे साथ बना रहता है । नामकरण, कर्णछेदन, विवाह इत्यादि में तो संगीत होता ही है । साथ ही ऐसा कोई तीज-त्योहार नहीं होता जिसमें संगीत न हो । घर में ही क्यों, हमारे यहाँ तो खेत में, चौपाल में, चक्की चलाने में और धान कूटने के समय भी संगीत चलता ही रहता है । यह हमारे जन-जीवन के उल्लास को प्रकट करने का प्रभावी साधन है ही, साथ में उसको गतिमान बनाने का भी प्रबल अस्त्र है । संगीत रचनात्मक कार्यों में असर होने की सामूहिक स्मृति और प्रेरणा प्रदान करता है और वह सामूहिक शक्ति देता है, जो हमें उन कार्यों को करने योग्य बनाता है जो अकेले या समूह में संगीत की प्रेरणा के बिना नहीं कर पाते ।
About गद य श पर आध र त प रश न - CBSE-CLASS-XII
गद य श पर आध र त प रश न is a vital chapter for CBSE-CLASS-XII aspirants. Mastering the concepts covered in this chapter is essential for securing a top rank.
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