सप रस ग व य ख य
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Chapter Questions 13 MCQs
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : ‘‘कुटज के ये सुंदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं । जो कालिदास के काम आया हो उसे ज़्यादा इज़्ज़त मिलनी चाहिए । मिली कम है । पर इज़्ज़त तो नसीब की बात है । रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ । दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया । लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली फेंक देती है । सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया था । एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया ! हुआ ही करता है । इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता । उनकी फक्कड़ाना मस्ती कहीं गई नहीं । अच्छे-भले कद्रदान थे । लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी ऐसी वितृष्णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं । मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकददानी से मुरझा गए होंगे – ऐसी ही मनःस्थिति में उन्होंने बिचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी ।’’
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
भारतेन्दु-मंडल की किसी सजीव स्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्कंठा रही होगी, यह अनुमान करने की बात है। मैं नगर से बाहर रहता था। एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई। जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे, वे अगुवा हुए। मील डेढ़ मील का सफर तय हुआ। पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए। नीचे का बरामदा खाली था। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत्त था। बीच-बीच में खंबे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर पीछे एक लड़के ने ऊँगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। ....... बस, यही पहली झाँकी थी।
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
‘‘पुर्ज़े खोलकर फिर ठीक करना उतना कठिन काम नहीं है, लोग सीखते भी हैं, सिखाते भी हैं, अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है उसे तो देखने दो । साथ ही यह भी समझा दो कि आपको स्वयं घड़ी देखना, साफ़ करना और सुधारना आता है कि नहीं । हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते इत्यादि ।’’
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी । दूभर दुख सो जाइ किमि काढी ॥
अब धनि देवस बिरह भा राती । जरै बिरह ज्यों दीपक बाती ॥
काँपा हिया जनावा सीऊ । तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ ॥
घर घर चीर रचा सब काहूँ । मोर रूप रँग लै गा नाहू ॥
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा । सुलगि सुलगि दगधै भै छारा ॥
यह दुख दगध न जानै कंतू । जोबन जनम करै भसमंतू ॥
पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग ।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग ॥
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कडुवे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लंब बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा।
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो –
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
किंतु यह भ्रम है... यह बाढ़ नहीं, पानी में डूबे धान के खेत हैं। अगर हम थोड़ी सी हिम्मत बटोरकर गाँव के भीतर चलें, तब वे औरतें दिखाई देंगी जो एक पाँव में झुकी हुई धान के पौधे छप-छप पानी में रोप रही हैं; सुंदर, सुघड़, धूप में चमकमारती काली रंगत और सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हैट, जो फ़ोटो या फ़िल्मों में देखे हुए वियतनामी या चीनी औरतों की याद दिलाते हैं। ज़रा-सी आहट पाते ही वे एक साथ सिर उठाकर चौकी हुई निगाहों से हमें देखती हैं — बिल्कुल उन युवा हिरणियों की तरह, जिन्हें मैंने एक बार कान्हा के वन्यस्थल में देखा था। किंतु वे डरती नहीं, भागती नहीं, सिर्फ़ विस्मय से मुस्कराती हैं और फिर सिर झुकाकर अपने काम में डूब जाती हैं... यह सम्पूर्ण दृश्य इतना साफ़ और सजीव है — अपनी स्वच्छ मासूमियत में इतना संपूर्ण और शाश्वत — कि एक क्षण के लिए विश्वास नहीं होता।
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
पूस जाड़ थरथर तन काँपा । सूरज जड़ाइ लंक दिसि तापा ॥
बिरह बादि भा दासन सीझ । काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ ॥
कंत कहाँ हैं लागौं हियरे । पंथ अपार सूझा नहीं नियरे ॥
सौर सुपोटी आवै जुड़ी । जानहूं सेज हिवंचल बूड़ी ॥
चकई निसि बिछुरें दिन मिला । हौं निसि बारस बिरह कोकिला ॥
रैन अकेल साथ नाही सकी । कैसे जिऔं बिछोरी पंखी ॥
बिरह सचान भए तन चाँड़ा । जीवत खाइ मुए नहीं छोड़ा ॥
रकत ढगा मांसू गरा, हाड़ भए सब संधा ॥
धनि सारस होइ रिरि मुई, आइ समेटहु पंख ॥
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
‘इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बंधी है नाव’’
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~।
यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकर्षक है। नाम है कि हज़ारों वर्ष से जीता चला आ रहा है। कितने नाम और गए। दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए। मगर कुटज है कि संस्कृत की निरंतर स्फीतमान शब्द राशि में जो जमके बैठा, सो बैठा ही है। और रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से अधिक कटोरे पापजन की कारा में रूंधा अजात जलस्तोत्र से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।
फगुन पवन झकोरै बागा। चौपइ रीति जाइ किमि सागा।।
तन जस पियरि पात भा भोगा। बिसरि न हिये पवन होइ झोगा।।
तविर झरे उरझे बन डोला। भइ अनुपम फूल फर फोला।।
कहिर बनाफूल कीन्हे हुलासु। मो कहँ लग्य अब दूषणु उदासु।।
मैंने देखा
एक बूँद सहसा
उछली सागर के झाग से;
रंग गई क्षणभर
ढलते सूरज की आग से।
मुझे दीख गया :
सून स्वरूप, सम्पूर्ण
हर आलोक – हुआ अपमान
है उन्मेषन
नश्वरता के दाग से।
About सप रस ग व य ख य - CBSE-CLASS-XII
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